Friday, 24 October 2014

संघर्ष

इन किताबों के ढेर में,
ज़िंदगी ढूंढ रहा हूँ मैं|
कोई तूफान,
आने वाला है, शायद!
इस अलौकिक शांति में,
किलकारी ढूंढ रहा हूँ मैं||

ये अंधकार साक्षी है,
उगते सूरज का,
या ये सूरज देख रहा है,
बढ़ते अंधकार को|
व़क्त है मेरे पास, या शायद!
व़क्त ढूंढ रहा हूँ मैं||

घनघोर घटा घर घिर आई,
मनमौजी बादल भी घुमड़े ,
झमझम-झमाझम जमकर बरसे,
बारिश में, लुफ्त ढूंढ रहा हूँ मैं|
इस चहकते कलरव में,
कोयल-कूक ढूंढ रहा हूँ मैं||

माँझी हूँ,
मंजिलें भी हैं,
मंझधार से किनारे का,
रास्ता ढूंढ रहा हूँ मैं|
यादों के असीम महासागर में,
स्थिर - द्वीप ढूंढ रहा हूँ मैं||

इन चार पंक्तियों के लिये,
फिलहाल तो शब्द ढूंढ रहा हूँ मैं|
शब्दों के अर्थ; अनर्थ ना हों,
इन दायरों के मायने ढूंढ रहा हूँ मैं||

2 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना...

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  2. Thank you Sanjay Bhaskar for your kind appreciation.

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